आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रथाओं को अक्सर पुरानी या बेकार समझा जाता है लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि यही वह धागा है जो समाज को जोड़ता है।
आधुनिक प्रगति और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखने के बीच हम संतुलन कैसे बना सकते हैं? क्या हम ‘आधुनिकीकरण’ की दौड़ में कुछ बहुत जरूरी खो रहे हैं?
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