2022 में अबोहर से जीत ने संदीप जाखड़ को पंजाब की राजनीति में मजबूत शुरुआत दी, लेकिन इसके बाद उनका सफर सीधा नहीं रहा, कांग्रेस से निष्कासन, बीजेपी के समर्थन में खुलकर बोलना, और अब एक स्वतंत्र नेता के रूप में काम करना, जबकि उनका झुकाव बीजेपी और सुनील कुमार जाखड़ के साथ साफ दिखता है। अबोहर जाखड़ परिवार का पारंपरिक गढ़ रहा है और सुनील जाखड़ का भी इस सीट से मजबूत रिकॉर्ड रहा है, ऐसे में 2027 से पहले सवाल सिर्फ वफादारी का नहीं, बल्कि सीट पर असली दावा किसका होगा, यह है। क्या संदीप जाखड़ अबोहर पर अपनी पकड़ बनाए रखेंगे और अपनी अलग पहचान बनाएंगे, या फिर सुनील जाखड़ की वापसी के लिए जगह छोड़ देंगे ?
2022 में अबोहर से जीत ने संदीप जाखड़ को पंजाब की राजनीति में मजबूत शुरुआत दी, लेकिन इसके बाद उनका सफर सीधा नहीं रहा, कांग्रेस से निष्कासन, बीजेपी के समर्थन में खुलकर बोलना, और अब एक स्वतंत्र नेता के रूप में काम करना, जबकि उनका झुकाव बीजेपी और सुनील कुमार जाखड़ के साथ साफ दिखता है। अबोहर जाखड़ परिवार का पारंपरिक गढ़ रहा है और सुनील जाखड़ का भी इस सीट से मजबूत रिकॉर्ड रहा है, ऐसे में 2027 से पहले सवाल सिर्फ वफादारी का नहीं, बल्कि सीट पर असली दावा किसका होगा, यह है। क्या संदीप जाखड़ अबोहर पर अपनी पकड़ बनाए रखेंगे और अपनी अलग पहचान बनाएंगे, या फिर सुनील जाखड़ की वापसी के लिए जगह छोड़ देंगे ?
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प्रेम सिंह चंदूमाजरा का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू होकर तीन बार सांसद बनने तक पहुंचा है, जो पंजाब की राजनीति में उनकी गहरी पकड़ को दिखाता है। हालांकि, 2022 में घनौर से मिली हार ने यह भी दिखाया कि अब अनुभवी नेताओं को भी बदलते वोटर मूड का सामना करना पड़ रहा है। अब, अकाली दल (पुनर सुरजीत) के साथ जुड़ने और 2027 के चुनाव करीब आने के बीच सवाल सिर्फ उनकी प्रासंगिकता का नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक दिशा का भी है। एक बड़ी हार और नए गुट में जाने के बाद, क्या शिरोमणि अकाली दल में वापसी उनके लिए नई ताकत ला सकती है, या अब इससे भी कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा ?
प्रेम सिंह चंदूमाजरा का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू होकर तीन बार सांसद बनने तक पहुंचा है, जो पंजाब की राजनीति में उनकी गहरी पकड़ को दिखाता है। हालांकि, 2022 में घनौर से मिली हार ने यह भी दिखाया कि अब अनुभवी नेताओं को भी बदलते वोटर मूड का सामना करना पड़ रहा है। अब, अकाली दल (पुनर सुरजीत) के साथ जुड़ने और 2027 के चुनाव करीब आने के बीच सवाल सिर्फ उनकी प्रासंगिकता का नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक दिशा का भी है। एक बड़ी हार और नए गुट में जाने के बाद, क्या शिरोमणि अकाली दल में वापसी उनके लिए नई ताकत ला सकती है, या अब इससे भी कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा ?
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Prem Singh Chandumajra’s long political journey, from student activism to becoming a three-time Member of Parliament, reflects deep roots in Punjab politics. However, his defeat from Ghanaur in the 2022 Assembly elections showed that even seasoned leaders are facing changing voter moods. Now, with his move to Akali Dal (Punar Surjit) and 2027 approaching, questions are not just about his relevance but also about his political direction. After a major setback and a change in faction, would returning to the parent Shiromani Akali Dal strengthen his position, or will that also not make much difference now ?
Prem Singh Chandumajra’s long political journey, from student activism to becoming a three-time Member of Parliament, reflects deep roots in Punjab politics. However, his defeat from Ghanaur in the 2022 Assembly elections showed that even seasoned leaders are facing changing voter moods. Now, with his move to Akali Dal (Punar Surjit) and 2027 approaching, questions are not just about his relevance but also about his political direction. After a major setback and a change in faction, would returning to the parent Shiromani Akali Dal strengthen his position, or will that also not make much difference now ?
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