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पंजाब विधानसभा ने जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 को सर्वसम्मति से पारित किया। लेकिन अकाल तख्त के समक्ष कार्यवाही के दौरान कई विधायकों ने स्वीकार किया कि उन्होंने विधेयक को पढ़े बिना ही उसके पक्ष में मतदान किया, क्योंकि उन्हें मसौदा बहुत देर से मिला था। यह स्वीकारोक्ति केवल एक कानून तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी विधायी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि जनप्रतिनिधि पंजाब के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विधेयकों में से एक को पढ़े बिना पारित कर सकते हैं, तो विधानसभा में कानून बनाने की गुणवत्ता पर क्या भरोसा किया जाए ? क्या अब कानून गंभीर विधायी समीक्षा के बजाय केवल पार्टी के निर्देशों पर पारित किए जा रहे हैं ? यदि विधायक स्वयं उन कानूनों को नहीं पढ़ते जिन पर वे मतदान करते हैं, तो जनता के हितों की रक्षा आखिर कौन कर रहा है ? यह घटना पंजाब की विधायी संस्कृति के बारे में क्या दर्शाती है ?

Suggestions - SLAH

A) ऐसा लगता है कि पार्टी अनुशासन, विधायी जिम्मेदारी पर भारी पड़ रहा है।

B) कानून गंभीर समीक्षा के बजाय राजनीतिक औपचारिकता बनते जा रहे हैं।

C) जो विधानसभा पहले मतदान करे और बाद में पढ़े, वह लोकतंत्र और जनविश्वास दोनों को कमजोर करती है।

D) यदि कानून बनाने वाले ही कानून बनाने को गंभीरता से नहीं लेते, तो लोकतंत्र की गरिमा और विश्वसनीयता दोनों कमजोर पड़ जाती हैं।

Voting Results

A 2%
B 8%
C 7%
D 83%
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