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अकाल तख्त द्वारा पंजाब सरकार को एक महीने के भीतर बेअदबी विरोधी कानून की "आपत्तिजनक" धाराओं में संशोधन करने का निर्देश दिए जाने के एक दिन बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कानून का जोरदार बचाव करते हुए कहा कि बेअदबी के दोषियों को सबसे कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए और पूछा, "बताइए, इसमें गलत क्या है ?" उनके ये बयान ऐसे समय आए हैं जब अकाल तख्त के समक्ष पेश हुए 69 आम आदमी पार्टी के विधायकों समेत अन्य सिख विधायकों में से कुछ ‘आप’ विधायकों ने स्वीकार किया कि उन्होंने विधेयक की सामग्री पढ़े बिना ही अपनी सहमति दे दी थी। ऐसे में एक बड़ा सवाल खड़ा होता है: जब अकाल तख्त ने कानून पर आपत्तियाँ जताई हैं और खुद कुछ विधायकों ने माना है कि उन्होंने विधेयक को पढ़े बिना मंजूरी दी, तो क्या सरकार को पहले अपनी विधायी प्रक्रिया पर उठे सवालों का जवाब देना चाहिए या बिना आत्ममंथन किए कानून का बचाव करते रहना चाहिए ?

Suggestions - SLAH

A) सरकार को पहले उठी आपत्तियों का समाधान करना चाहिए, उसके बाद ही कानून को त्रुटिहीन बताना चाहिए।

B) जब किसी कानून को बनाने की प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो उसका बचाव करना आसान नहीं रहता।

C) मज़बूत सरकारें केवल कानून का बचाव नहीं करतीं, बल्कि संवाद और समीक्षा के माध्यम से उसे और बेहतर बनाती हैं।

D) जनता का भरोसा तब बढ़ता है, जब सरकारें उचित सवालों के सामने अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने का साहस दिखाती हैं।

Voting Results

A 12%
B 43%
C 30%
D 15%
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